रविवार, 27 जून 2010

कुत्ते के द्वारा शुभाशुभ शकुन विचारने का नियम

कुत्ता आज के जमाने में प्रत्येक घर में मिल जाता है,और सभी को पता है कि कुत्ता की अतीन्द्रिय जागृत होती है,किसी भी होनी अनहोनी को वह जानता है,अद्र्श्य आत्मा को देखने और किसी भी बदलाव को सूंघ कर जान लेने की क्षमता कुत्ते के अन्दर होती है,कुत्ते को दरवेश का दर्जा दिया गया है,समय असमय को बताने में कुत्ता अपनी भाषा में इन्सान को बताने की कोशिश करता है,और जो कुत्ते की भाषा को समझते है,वे अनहोनियों से बचे रहते है,और जो मूर्ख होते है,और अपने को जबरदस्ती हानि की तरफ़ ले जाना चाहते है वे उसकी भाषा को बकवास कह कर टाल देते है, कुत्ता अगर यात्रा के शुरु करते ही किसी कचडे पर पेशाब करता है,तो जान लीजिये कि यात्रा या शुरु किया जाने वाला कार्य सफ़ल है,यदि किसी सूखी लकडी पर पेशाब करता है,तो भौतिक धन की प्राप्ति होती है,अगर कुत्ता कांटेदार झाड पर,पत्थर या राख पर पेशाब करने के बाद काम शुरु करने वाले के आगे चल दे तो वह कार्य खराब हो जाता है,यदि कुत्ता किसी कपडे को लाकर सामने खडा हो तो समझना चाहिये कि कार्य सफ़ल है,यदि कुत्ता कार्य शुरु करने वाले के पैर चाटे,कान फ़डफ़डाये,अथवा काटने को दौडे तो समझना चाहिये कि सामने काफ़ी बाधायें रही है,यदि कुत्ता यात्रा के समय या काम शुरु करने के समय अपने शरीर को खुजलाना चालू कर दे तो जान लेना चाहिये के वह कार्य करने अथवा यात्रा पर जाने से मना कर रहा है,यदि कुत्ता किसी कार्य को शुरु करते वक्त या यात्रा पर जाते वक्त चारों पैर ऊपर की तरफ़ करके सोये तो भी कार्य या यात्रा नही करनी चाहिये,यदि गली मोहल्ले के आवारा कुत्ते किसी भी समय ऊपर की तरफ़ मुंह करके रोना चालू करें तो समझना चाहिये कि उस गली या मोहल्ले के प्रमुख व्यक्ति पर कोई मुशीबत आने वाली है,यात्रा करने के साथ या काम करने के साथ कुत्ते आपस में लड पडें तो भी काम या यात्रा में विघ्न पैदा होता है,कुत्ते के कान फ़डफ़डाने का समय सभी कामों के लिये त्यागने में ही भलाई होती है,कुत्ता अगर बैचैन होकर इधर उधर भागना चालू करे,तो समझना चाहिये कि कोई आकस्मिक मुशीबत रही है,किसी बात को सोचने के पहले या धन खर्च करते वक्त अगर कुत्ता अपनी पूंछ को पकडने की कोशिश करता है,तो मान लेना चाहिये कि आपने अपने भविष्य के लिये नही सोचा है,और खर्च करने के बाद पछताना पडेगा,कुत्ता अगर सुबह के समय लान या बगीचे में घास खा रहा हो तो समझ लेना चाहिये कि घर के अन्दर जो खाना बना है,उसमे किसी प्रकार इन्फ़ेक्सन है,कुत्ता अगर जूता लेकर भाग रहा हो तो समझना चाहिये कि वह बाहर जाने से रोक रहा है,लडकी के अपने ससुराल जाने के वक्त अगर कुत्ता रोना चालू कर दे,तो समझना चाहिये कि लडकी को ससुराल से वापस आने में संदेह है,कुत्ता अगर मालिक के पैर के पास जाकर सोना चालू कर दे तो समझना चाहिये कि घर में किसी सदस्य के आने का संकेत है,कुत्ता अगर अपने खुद के पैर चाटना चालू करे तो यात्राओं की शुरुआत समझनी चाहिये,कुत्ता अगर एकान्त में बैठना चालू कर दे,और बुलाने से आने में आनाकानी करे तो समझना चाहिये कि घर मे किसी सदस्य के लम्बी बीमारी में जाने का संकेत है,कुत्ता अगर पूंछ नीचे डालकर मुख्य दरवाजे के पास कुछ खोजने का प्रयत्न कर रहा हो तो समझना चाहिये कि कोई कर्जा मांगने वाला रहा है,कुत्ता अगर भोजन करते वक्त बार बार बाहर और अन्दर भाग रहा हो तो समझना चाहिये कि भोजन और कोई करने आने वाला है.

शनि पर तेल चढ़ाने का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व।


शनि पर तेल चढ़ाने का धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों महत्व है। शनि न्यायप्रिय ग्रह है और श्रम से प्रसन्न होते हैं। शनि की नाराजी श्रम से दूर की जा सकती है लेकिन उस श्रम के लिए हमारे शरीर में शक्ति, स्वास्थ्य और सामथ्र्य रहे, इसके लिए शनि को तेल चढ़ा कर प्रसन्न किया जाता है। पुराणों में शनि को तेल चढ़ाने के पीछे कई भिन्न-भिन्न कथाएं हैं। मुख्यत: ये सारी कथाएं रामायण काल और विशेष रूप से भगवान हनुमान से जुड़ी हैं। अलग-अलग कथाओं में शनि को तेल चढ़ाने की चर्चा है लेकिन सार सभी का यही है। शनि नीले रंग का क्रूर माना जाने वाला ग्रह है, जिसका स्वभाव कुछ उद्दण्ड था। अपने स्वभाव के चलते उसने श्री हनुमानजी को तंग करना शुरू कर दिया। बहुत समझाने पर भी वह नहीं माना तब हनुमानजी ने उसको सबक सिखाया। हनुमान की मार से पीड़ित शनि ने उनसे क्षमा याचना की तो करुणावश हनुमानजी ने उनको घावों पर लगाने के लिए तेल दिया। शनि महाराज ने वचन दिया जो हनुमान का पूजन करेगा तथा शनिवार को मुझपर तेल चढ़ाएगा उसका मैं कल्याण करुंगा।धार्मिक महत्व के साथ ही इसका वैज्ञानिक आधार भी है। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि शनिवार को तेल लगाने या मालिश करने से सुख प्राप्त होता है। उक्त वाक्य और शनि को तेल चढ़ाने का सीधा संबंध है। ज्योतिष शास्त्र में शनि को त्वचा, दांत, कान, हड्डियों और घुटनों में स्थान दिया गया है। उस दिन त्वचा रुखी, दांत, कान कमजोर तथा हड्डियों और घुटनों में विकार उत्पन्न होता है। तेल की मालिश से इन सभी अंगों को आराम मिलता है। अत: शनि को तेल अर्पण का मतलब यही है कि अपने इन उपरोक्त अंगों की तेल मालिश द्वारा रक्षा करो।दांतों पर सरसो का तेल और नमक की मालिश। कानों में सरसो तेल की बूंद डालें। त्वचा, हड्डी, घुटनों पर सरसो के तेल की मालिश करनी चाहिए। शनि का इन सभी अंगों में वास माना गया है, इसलिए तेल चढ़ाने से वे हमारे इन अंगों की रक्षा करते हैं और उनमें शक्ति का संचार भी करते हैं।

शुक्रवार, 25 जून 2010

लाल किताब में राहु का प्रत्येक भाव के लिए उपाय

लाल किताब के अनुसार ग्रह चाहे शुभ स्थिति में हो या अशुभ उसका उपाय करने से जहाँ उसके फल में स्थायित्व रहता (Result intact in Lal Kitab) हें, वही दूसरी तरफ अशुभ ग्रह का उपाय करने से उसके दूष्प्रभाव की शान्ति होती है. इस लेख के माध्यम से राहु ग्रह के प्रत्येक भाव मेँ स्थित होने पर उसके उपाय की जानकारी दी गई है. प्रत्येक व्यक्ति जिनका राहु जिस-2 भाव में स्थित है वह यहाँ दी गई सूची के आधार पर उपाय कर सकता है.
प्रथम भाव में स्थित राहु के उपाय (Remedies of in Rahu first house)1) गले में चाँदी धारण करें।2) जौ दूध में धोकर जल में प्रवाहित करें।3) रात में सिरहाने सौंफ रखकर सोएं.4) गूड़ गेहुं ताम्बे का दान करें.

द्वितीय भाव में स्थित राहु के उपाय (Remedies of Rahu in second हाउस 1) ठोस चांदी अपने पास रखें।2) दो किलो सिक्के के टुकडे चलते पानी में डालें।3) चाँदी की गोली गले में पहनें.4) घर में मन्दिर की स्थापना न करें.

तृ्तीय भाव में स्थित राहु के उपाय (Remedies of Rahu in third house)1) हाथी का खिलौना घर में न रखें।2) हाती दाँन्त घर में न रखें.

चतुर्थ भाव में स्थित राहु के उपाय (Remedies of Rahu in fourth house1) गंगा जल से स्नान करें।2) चाँदी के चार गोली सफेद कपडा में बाँधकर अपने पास रखें.3) जौ में जौ से चार गुना दूध मिलाकर जल में प्रवाहित करें.4) माता की सेवा करें.

पंचम भाव में स्थित राहु के उपाय (Remedies of Rahu in fifth house) 1) हाथी दाँत घर में न रखें।2) चाँदी का हाथी चाँदी की कटोरी में जल डालकर रखें.3) भोजन रसोई घर में ही करें.4) अपनी पत्नी से दुबारा शादी करें.5) कीकर की दातुन करें.6) मीठी वाणी बोले.

छटे भाव में स्थित राहु के उपाय (Remedies of Rahu in sixth house)1) काले रंग का कुत्ता पालें।2) भाई को अपनी साथ रखें.3) सिक्के की गोली अपने पास रखें.4) शराब, अण्डा, मांस से परहेज करें.

सप्तम भाव में स्थित राहु के उपाय (Remedies of Rahu in seventh house1) चांदी का चौकर टुकडा़ अपनी जेब में रखें।2) कुत्ता पालें.3) किसी के साथ भी साझेदारी न करें.4) चार बोतल शराव खोलकर चलती पानी में डालें.5) अपने वजन के बराबर जौ दूध में धोकर चलते पानी में डालें.

अष्टम भाव में स्थित राहु के उपाय (Remedies of Rahu in eighth house)1) चाँदी का चौकोर टुकडा़ अपने पास रखें।2) रात को सिरहाने सौफ , देसी खाण्ड रखें.3) बेईमानी और गलत कामो से दूर रहें.4) बिजली के सामान का कारबार न करें.5) जल में सिक्का प्रवाहित करें.6) मन्दिर में बादाम चढाकर आधे घर में रखें, बाद में उसे बहते पानी में प्रवाहित करें.

नवम भाव में स्थित राहु के उपाय (Remedies of Rahu ninth house)1) पिता के साथ रहें व उनकी सेवा करें।2) ईमानदारि की कमाई खाएं3) कुत्ता पाले।4) ससुराल से अच्छे सम्बन्ध रखें.5) नीले व काले रंग का कपडा न दे.6) बिजली का सामान मुफ्त न लें.7) धर्म - कर्म करते रहें.

दशम भाव में स्थित राहु के उपाय (Remedies of Rahu in tenth house)1) सिर ढककर रखें।2) शराव, अण्डा, मांस सेवन न करें.]3) रात को दूध न पीये.4) अन्धों को अपने हाथ से भोजन खिलाएं.

एकादश भाव में स्थित राहु के उपाय (Remedies of Rahu in eleventh house)1) शराव, अण्डा, मांस से परहेज रहें।2) पिता की सेवा करें व उनके साथ रहें.3) सोना अपने पास रखें.4) जौ, सिक्का, नारियल बहते पानी में प्रवाहित करें.5) गरीबो को पैसा दान में देते रहें.6) निले रंग का कपडा़ ना पहने ना अपना पास रखें7) लोहे का कडा, छल्ला या चेन पहनें.8) मन्दिर में प्रतिदिन जाया करें.

द्वादश भाव में स्थित राहू के उपाय (Remedies of Rahu in twelveth house)1) नशीली वस्तुओं का सेवन न करें.2) रात में सिरहाने खाण्ड या सौफ रखकर सोएं.3) रसोई घर ही भी खाना खाएं.
इस प्रकार लाल किताब के अनुसार राहु के उपाय (Remedies of Rahu in Lal Kitab) करने से तुरन्त लाभ मिलता हैं।

नोट 1) एक समय में केवल एक ही उपाय करें.2) उपाय कम से कम 40 दिन और अधिक से अधिक 43 दिनो तक करें.3) उपाय में नागा ना करें यदि किसी करणवश नागा हो तो फिर से प्रारम्भ करें.4) उपाय सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक करें.5) उपाय खून का रिश्तेदार ( भाई, पिता, पुत्र इत्यादि) भी कर सकता है.

सप्तम भाव बताएगा जीवन का रहस्य

सप्तम हो दूषित तो दाम्पत्य जीवन हो खराब
दाम्पत्य जीवन तभी सही चलता है जब एक-दूसरे में सही तालमेल हो अन्यथा जीवन नश्वर ही समझो। दाम्पत्य की गाडी़ सही चले इसके लिए अपने जीवनसाथी का स्वभाव व व्यवहार के साथ वाणी भी अच्छी होना चाहिए। वहीं पति को भी अपनी पत्नी के प्रति सजग व वफादार होना चाहिए। कई बार दाम्पत्य जीवन आर्थिक दृष्टिकोण की वजह से, अन्य संबंधों के चलते भी टूट जाता है। शंका भी दाम्पत्य जीवन में दरार का कारण बनती है। कभी-कभी पारिवारिक तालमेल का अभाव भी एक कारण बनता है। इन सबके लिए सप्तम भाव, लग्न, चतुर्थ, पंचम भाव के साथ-साथ शुक्र-शनि-मंगल का संबंध भी महत्वपूर्ण माना गया है। चतुर्थ भाव में यदि शनि सिंह राशि का हो या मंगल की मेष या वृश्चिक राशि का हो या राहु के साथ हो तो पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण रहता है। शनि-मंगल का दृष्टी संबंध हो या युति हो तो भी पारिवारिक जीवन नष्ट होता है। कोई भी नीच का ग्रह हो तब भी पारिवारिक कलह का कारण बनता है। यदि ऐसी स्थिति हो तो उस ग्रह से संबंधित वस्तु को जमीन में गाड़ देवें। लग्न का स्वामी नीच का हो या लग्न में कोई नीच ग्रह हो तो वह जातक को बुरी प्रवृति का बना देता है।

लग्न का स्वामी शनि मंगल से पीडि़त नहीं होना चाहिए। पंचम भाव प्रेम व सन्तान का होता है यदि यह भाव शनि-मंगल के साथ हो या दृष्टि संबंध रखता हो तो उस जातक के जीवन में सन्तान का अभाव या सन्तान से पीडा़ रहती है व उसके जीवन में प्रेम का अभाव रह सकता है। सप्तम भाव जीवनसाथी का होता है, इस भाव का स्वामी राहु से पीडि़त हो तो दाम्पत्य जीवन बाधित रहेगा। इस भाव में भावेश के साथ शनि-मंगल हो तो द्वितीय विवाह होता है या दाम्पत्य जीवन में बाधा रहती है। सप्तमेश एक घर पीछे यानी (छठवें भाव) सप्तम से द्वादश होगा ऐसी स्थिति भी बाधा का कारण बनती है। यदि ऐसी स्थिति किसी की पत्रिका में हो तो वे उससे संबंधित वस्तु को एक दिन अपने पास रखकर सोए एवं किसी स्वच्छ जमीन में या श्मशान भूमि में गाड़ दें। शुक्र कला, प्रेम, दाम्पत्य का कारक नीच का हो, अस्त हो या वक्री हो तो दाम्पत्य जीवन में बाधा रहती है। लग्न में मंगल हो व शनि सप्तम भावस्थ हो तो निश्चित बाधा का कारण बनता है। सप्तमेश अष्टम में होना भी कष्टकारी रहता है। शुक्र सूर्य से अस्त हो या सूर्य-बुध के साथ शुक्र का होना भी ठीक नहीं रहता।लग्न में सूर्य या सप्तम में शनि या सूर्य हो तो विवाह में बाधा का कारण बनता है। सप्तम भाव के एक घर पीछे व एक घर आगे क्रूर ग्रह का होना भी ठीक नहीं रहता। नीच का गुरु भी ठीक फल नहीं देता, गुरु के साथ राहु का होना भी कहीं ना कहीं कष्टकारी बनता ही है। शुक्र मंगल की राशि में हो व मंगल शुक्र की राशि में हो तो उस जातक का चरित्र संदिग्ध रहता है। इस कारण दाम्पत्य जीवन में बाधा रहती है।

राशि और रत्न

जो भी व्यक्ति जन्म लेता है उसका अपना एक लग्न होता है. सभी लग्न एक राशि है जिनका अपना एक स्वामी होता है. ज्योतिषशास्त्र का मानना है कि व्यक्ति अगर अपनी राशि के अनुरूप उपयुक्त रत्न धारण करता है तो उसे जल्दी और आसानी से सफलता मिलती है. किस राशि के साथ कौन सा रत्न उपयुक्त है उसके विषय में ज्योतिषशास्त्र का निम्न कथन है.
मेष राशि मेष राशि सूर्य के क्रांतिपथ में लगभग 1.2 से 2.8 घंटे तक खगोलीय देशान्तर मे होता है. इसका अक्षांशीय विस्तार 30 डिग्री उत्तर से 10 डिग्री दक्षिण तक है. मेष नेतृत्व का गुण प्रदान करता है. सजग और सक्रिय बनाये रखता है. इस लग्न की एक विशेषता यह भी है कि इससे प्रभावित व्यक्ति चुनौतियों के लिए सदैव तैयार होता है. जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए ये हमेशा तत्पर रहते हैं. इस राशि का नाकारात्मक पक्ष यह है कि इसमें क्रोध अधिक होता है. इससे प्रभावित व्यक्ति जल्दी किसी बात को लेकर उत्तेजित हो जाता है. इनमें हठ भी अधिक होता है. इस राशि वालो को मूंगा , गारनेट या रेड एजेट पहनने की सलाह दी जाती है.
वृष राशि भचक्र की दूसरी राशि है वृष. क्रांति पथ में यह मेष और मिथुन के बीच होता है. इसका देशांतरीय विस्तार 3.2 से 5. 8 घंटा है और अक्षांशीय विस्तार 30डिग्री से भूमध्य रेखा तक है. इस राशि का साकारात्मक पक्ष है कि इससे प्रभावित व्यक्ति धन और भाग्य प्राप्त करता है. इनमें धैर्य होता है लेकिन शत्रु बली ही क्यों न हो अगर ठान ले तो उसे परास्त करके ही रहते हैं. इस राशि में परिश्रम का गुण भी होता है. ये अपने काम में सतत् लगे रहते हैं. अगर व्यक्ति पुरूष है तो महिलाओं के बीच लोकप्रिय होता है. इस राशि का नाकारात्मक पक्ष है अत्यधिक भावुक होना. इन्हें कोई भी आसानी से अपनी ओर मिला लेता है. इस लग्न व्यक्तियों को हीरा ,अम्बर , ओपल , फिरोजा धारण करने की सलाह दी जाती है.
मिथुन राशि तीसरी राशि मिथुन का स्थान वृष और कर्क के बीच है इसका देशांतरीय विस्तार 6.1 से 8.4 घंटे तक है. अक्षांशीय विस्तार 35 डिग्री उत्तर से 10 डिग्री दक्षिण तक है. इस राशि का सकारात्मक पक्ष है संगीत एवं नृत्य से गहरा लगाव. खेल एवं कला के क्षेत्र में आगे रहना. सुन्दर और आकर्षक दिखना. कलहपूर्ण स्थिति में मध्यस्थ बनकर स्थिति को शांतिपूर्ण बनाना. इसका नाकारात्मक पक्ष है कि जिन्हें कामयाबी देर से मिलती है. इनके व्यवहार में बालपन झलकता है. इस लग्न के व्यक्ति को पन्ना , जेड , पेरीडोट पहनना लाभदायक होता है.
कर्क राशि चौथी राशि है कर्क. यह सूर्य के क्रांतिपथ में मिथुन और सिंह राशि के बीच होता है. इस राशि का विस्तार देशान्तर में 7.8 से 9.5 घंटे तक है. इसका अक्षांशीय विस्तार 34 डिग्री उत्तर से 4 डिग्री दक्षिण है. इस राशि का गुण है किसी विषय को गहराई से समझना. जो व्यक्ति इस राशि से प्रभावित होता है उनमें दूसरो को समझने की अद्भुत क्षमता होती है. व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता अच्छी होती है. लिखने एवं बोलने की कला में व्यक्ति कुशल होता है. इस राशि का दूसरा पक्ष है अपने मन की करना. छोटी छोटी बातों पर रूठ जाना, अति संवेदनशील होना. कर्क लग्न का व्यक्ति सैर सपाटे का भी शौकीन होता है. मोती , एजेट एवं मूनस्टोन धारण करने से कर्क राशि के लोगों को लाभ मिलता है.
सिंह राशि भचक्र की पांचवीं राशि है सिह. यह सूर्य की क्रांतिपथ में कर्क और कन्या राशि के बीच होता है. इसका आभासीय विस्तार 9.4 से 12 घंटे तक है. इस राशि का गुण है साहसी और नेतृत्व कुशल होना. यह राशि जितनी उदार है उतनी ही संघर्षशील भी है. इस राशि को नियमपालन और व्यवस्थित रहना पंसद है. इस राशि का नाकारात्मक पक्ष है क्रोधी होना. किसी भी चीज़ के लिए परवाह नहीं करना एवं आलसपन. इन्हें पित्त सम्बन्धी रोग होने की संभावना प्रबल रहती है. रेड ओपल , रूबी अथवा गारनेट रत्न धारण करना इन्हें लाभ देता है.
कन्या राशि कन्या छठी राशि है. यह सूर्य के क्रांतिपथ में सिंह और तुला के बीच में स्थित होता है. इस राशि का देशांतरीय विस्तार 11.2 से 15.8 घंटा है. इसका अक्षांशीय विस्तार 15 डिग्री उत्तर से 23 डिग्री दक्षिण है. इस राशि की विशेषता है कि किसी भी कठिनाई एवं मुश्किलों से निकलने के लिए तेजी से प्रयास करते हैं और इनमें सफल भी होते हैं. कला एवं शिल्पशास्त्र के प्रति इनमें लगाव रहता है. प्रेम के विषय मे ये अधिक उत्साहित होते हैं. ये अपने परिवार और पत्नी एवं बच्चों के प्रति अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक रहते हैं. इस नक्षत्र के कुछ नाकारात्क पहलू भी हैं जैसे ये अत्यंतु भावुक होते हैं. विपरीत लिंग वाले व्यक्ति इन्हें विशेष आकर्षित करते हैं. अनजाने में ही किसी साजिश में फंस जाते हैं. इस राशि के व्यक्ति को पन्ना, पेरीडोट, ओनेक्स अथवा फिरोजा धारण करना चाहिए.
तुला सूर्य के क्रांतिपथ में कन्या और वृश्चिक के बीच रहने वाली सातवीं राशि है तुला इस राशि का देशांतरीय विस्तार 14. 4 से 16 घंटा है जबकि अक्षांशीय विस्तार भूमध्य रेखा से 30 डिग्री दक्षिण है. इस राशि का साकारात्मक पहलू है अत्यधिक पैसा कमाने के लिए उत्सुक रहना. व्यापार में कुशलता का प्रदर्शन. अन्तर्राष्ट्री व्यापार में भी इन्हें सफलता मिलती है. मस्तिष्क संतुलत होता है. ये जासूसी में भी काफी आगे होते हैं. कला के क्षेत्र में से भी इनका विशेष लगाव होता है. नृत्य एवं रंगमंच में कामयाब होते है. दिखने में सामान्य होते हैं. आमतौर पर यह राशि आयुष्मान होती है. इस राशि का नाकारात्मक पहलू है अपने वर्चस्व साबित करने के लिए उत्सुक रहना. अपने फायदे के लिए झूठ बोलना. ओपल , ब्लू डायमंड , स्फटिक , ब्लू टोपाज इस राशि के लिए शुभ रत्न होता है.
वृश्चिक राशि राशिचक्र की आठवीं राशि है वृश्चिक है. इस राशि का स्वामी मंगल को माना जाता है. क्रांतिपथ में इसका स्थान तुला और धनु राशि के बीच है. इसका देशान्तरीय विस्तार लगभग 15. 8 से 18. 0 घंटा है. वृश्चिक राशि का अक्षांशीय विस्तार 10 से 45 डिग्री दक्षिण में है. यह राशि वीर, साहसी एवं योद्धा के रूप में जाना जाता है. यह राशि कठोर मानी जाती है. इस राशि का विशेष गुण है जो भी लक्ष्य हो उसे किसी भी हाल में प्राप्त करना. इनमें सीखने की इच्छा बलवती होती है इसलिए विषयों को जानने समझने के लिए धैर्य और शांतिपूर्वक ध्यान केन्द्रित रखते हैं. इस राशि का दूसरा पहलू है चालाकी और होशियारी. अपना काम निकलते ही पल्ला झाड़ना भी इन्हें खूब आता है. विपरीत लिंग वाले व्यक्ति के प्रति इनका व्यवहार रूखा होता है. इन्हें टाईगर आई , इंद्रगोप अथवा मूंगा धारण करना चाहिए.
धनुराशि भचक्र की नौवीं राशि है धनु. यह वृश्चिक और मकर राशि के बीच स्थित होता है. इस राशि का देशांतरीय विस्तार 17.6 से 20.8 घंटा होता है. इसका अक्षांशीय विस्तार 12 डिग्री उत्तर से 45 डिग्री दक्षिण है. बेबीलोनिया की कथा में इसे युद्ध का देवता माना गया है. यह राशि दिखने में मजबूत और शक्तिशाली है. पैर मांसल होते हैं. किसी कार्य में आगे बढ़कर कार्य को अंजाम देते हैं. धन संचय की कला में काफी होशियार होते हैं. इनकी बातें प्रभावशाली और मोहित करने वाली होती है. अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए सजग और तत्पर रहते हैं. इस राशि का कमजोर पक्ष है किसी कार्य को पूरा करने के लिए जरूरत से जल्दी जल्दबाजी दिखाना जिसके कारण बनता हुआ काम भी अधूरा रह जाता है. आमतौर पर कार्य को तेजी से करते हैं लेकिन कार्य पूरा किए बिना दूसरों के ऊपर कार्य सौप कर उस काम से हट जाते हैं. इन्हें पाचन सम्बन्धी परेशानियों का भी सामना करना होता है. इस राशि का रत्न है टोपाज, पुखराज और पीरोजा.
मकर राशिमकर राशि भचक्र की दशवीं राशि है .इस राशि का स्थान सूर्य के क्रांतिपथ में धनु और कुम्भ राशि के बीच है. इस राशि का देशांतरीय विस्तार 20.3 से 22.2 घंटा है. इस राशि का अक्षांशीय विस्तार 8 से 28 डिग्री दक्षिण में है. मकर राशि शिक्षा और पठन पाठन में रूचि रखता है. इसे संगीत और नृत्य भी काफी पसंद होता है. दूसरों की मदद एवं सहायता के लिए तैयार रहना भी इसका गुण है. इस राशि का गुण है कि इससे प्रभावित व्यक्ति जहां भी होता हैं शाति और सौहार्द बनाये रखने में योगदान देता है. मकर राशि का नाकारात्मक पहलू है कि इनके हिस्से में परिश्रम और चिंता अधिक होती है. परिवार से इन्हें विशेष सहयोग नहीं मिल पाता है. भाग्य देर से जागता है इसलिए मेहनत का फल भी देर से मिलता है. इस राशि से प्रभावित व्यक्तियों को रोज गारनेट, लेपिस अथवा नीली पहनने की सलाह दी जाती है.
कुम्भ राशि राशिचक्र की ग्यारहवीं राशि का देशांतरीय विस्तार 20.5 से 24 घंटा तक है. 3 डिग्री उत्तर से 25 डिग्री दक्षिण इसका अक्षांशीय विस्तार है. बेबिलोनिया के धर्म कथाओं में इसे समुद्र का देवता कहा गया है. इस राशि का सकारात्मक पहलू है गहरी अन्तर्दृष्टि, सिद्धांतों और नियम का पालन करना. इसके अंदर ज्ञान का भंडार होता है जो समय और जरूरत के समय दिखाई देता है. इन्हें मनोरंजन पंसद होता है. सीखने के प्रति उत्सुक और लगनशील होना. इसका नाकारात्मक पहलू है शारीरिक रूप से कमज़ोर दिखना, मन में पराजय की भावना. दूसरों से मिलना जुलना भी इन्हें विशेष पसंद नहीं होता है. इस राशि का रत्न है. नीलम , लेपिस और नीली.
मीन राशि मीन राशिचक्र की बारहवीं राशि है. इस राशि का अक्षांशीय विस्तार 33 डिग्री उत्तर से 6 डिग्री दक्षिण में है. इसका देशांतरीय विस्तार 22.8 से 22 घंटा है. क्रांतिपथ में यह कुम्भ और मीन राशि के बीच होता है. यह राशि की विशेषता है बुद्धिमानी और जीवन के प्रति उत्साहित होना. प्यार और दोस्ती के प्रति उर्जावान दिखना. हमेशा नया करने की चाहत भी इसमें होती है. यह राशि धर्म और अध्यात्म के प्रति श्रद्धावान बनाती है. इसका कमज़ोर पहलू है शारीरिक तौर पर मोटा दिखना, आलसपन और लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए अत्यधिक उत्साहित रहना. इनका रत्न है पुखराज एवं टाटरी.

टोने-टोटके - कुछ उपाय –

छोटे-छोटे उपाय हर घर में लोग जानते हैं, पर उनकी विधिवत्‌
जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं। इस लोकप्रिय
स्तंभ में उपयोगी टोटकों की विधिवत्‌ जानकारी दी जा रही है...


परीक्षा में सफलता हेतु : परीक्षा में सफलता हेतु गणेश रुद्राक्ष धारण करें। बुधवार को गणेश जी के मंदिर में जाकर दर्शन करें और मूंग के लड्डुओं का भोग लगाकर सफलता की प्रार्थना करें।
पदोन्नति हेतु : शुक्ल पक्ष के सोमवार को सिद्ध योग में तीन गोमती चक्र चांदी के तार में एक साथ बांधें और उन्हें हर समय अपने साथ रखें, पदोन्नति के साथ-साथ व्यवसाय में भी लाभ होगा।
मुकदमे में विजय हेतु : पांच गोमती चक्र जेब में रखकर कोर्ट में जाया करें, मुकदमे में निर्णय आपके पक्ष में होगा।
पढ़ाई में एकाग्रता हेतु : शुक्ल पक्ष के पहले रविवार को इमली के २२ पत्ते ले आएं और उनमें से ११ पत्ते सूर्य देव को ¬ सूर्याय नमः कहते हुए अर्पित करें। शेष ११ पत्तों को अपनी किताबों में रख लें, पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी।
कार्य में सफलता के लिए : अमावस्या के दिन पीले कपड़े का त्रिकोना झंडा बना कर विष्णु भगवान के मंदिर के ऊपर लगवा दें, कार्य सिद्ध होगा।
व्यवसाय बाधा से मुक्ति हेतु : यदि कारोबार में हानि हो रही हो अथवा ग्राहकों का आना कम हो गया हो, तो समझें कि किसी ने आपके कारोबार को बांध दिया है। इस बाधा से मुक्ति के लिए दुकान या कारखाने के पूजन स्थल में शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को अमृत सिद्ध या सिद्ध योग में श्री धनदा यंत्र स्थापित करें। फिर नियमित रूप से केवल धूप देकर उनके दर्शन करें, कारोबार में लाभ होने लगेगा।
गृह कलह से मुक्ति हेतु : परिवार में पैसे की वजह से कलह रहता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख में पांच कौड़ियां रखकर उसे चावल से भरी चांदी की कटोरी पर घर में स्थापित करें। यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को या दीपावली के अवसर पर करें, लाभ अवश्य होगा।
क्रोध पर नियंत्रण हेतु : यदि घर के किसी व्यक्ति को बात-बात पर गुस्सा आता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख को साफ कर उसमें जल भरकर उसे पिला दें।
मकान खाली कराने हेतु : शनिवार की शाम को भोजपत्र पर लाल चंदन से किरायेदार का नाम लिखकर शहद में डुबो दें। संभव हो, तो यह क्रिया शनिश्चरी अमावस्या को करें। कुछ ही दिनों में किरायेदार घर खाली कर देगा। ध्यान रहे, यह क्रिया करते समय कोई टोके नहीं।
बिक्री बढ़ाने हेतु : ग्यारह गोमती चक्र और तीन लघु नारियलों की यथाविधि पूजा कर उन्हें पीले वस्त्र में बांधकर बुधवार या शुक्रवार को अपने दरवाजे पर लटकाएं तथा हर पूर्णिमा को धूप दीप जलाएं। यह क्रिया निष्ठापूर्वक नियमित रूप से करें, ग्राहकों की संख्या में वृद्धि होगी और बिक्री बढ़ेगी।

चन्द्र की युति और उसका फल

नवग्रहों में चन्द्र को रानी का दर्जा प्राप्त है. सूर्य के समान इसकी भी एक राशि है कर्क राशि जो जल तत्व की राशि होती है. इसे मन और चंचलता का कारक माना जाता है. जहां तक इसकी प्रकृति की बात यह है तो यह शांत व सौम्य ग्रह होता है. इसका रंग सफेद होता है. चन्द्रमा जब कुण्डली में किसी अन्य ग्रह के साथ युति सम्बन्ध बनाता है तो कुछ ग्रहों के साथ इसके परिणाम शुभ फलदायी होते हैं तो कुछ ग्रहों के साथ इसकी शुभता में कमी आती है. आपकी कुण्डली में चन्द्रमा किसी ग्रह के साथ युति बनाकर बैठा है तो इसके परिणामों को आप इस प्रकार देख सकते हैं.
चन्द्र व सूर्य की युति अगर आपकी कुण्डली में चन्द्र के साथ सूर्य विराजमान है तो आप कुटनीतिज्ञ होंगे. इस युति के प्रभाव के कारण आपकी वाणी में नम्रता व कोमलता की कमी हो सकती है तथा आप अभिमानी हो सकते हैं जिससे लोगों के प्रति आपका व्यवहार रूखा हो सकता है. इन स्थितियों में सुधार के लिए आपको चन्द्र के उपाय करने चाहिए.
चन्द्र व मंगल की युति कुण्डली में मंगल के साथ चन्द्र का स्थित होना यह संकेत देता है कि परिणाम की चिंता किए बगैर आप अपने कार्य में जुट जाते हैं जो कभी-कभी आपके लिए परेशानियों का भी कारण बन जाता है. आपकी कुण्डली में चन्द्र मंगल की युति है तो वाणी पर नियंत्रण रखना आपके लिए बहुत ही आवश्यक होता है क्योंकि, बोल चाल में आप आक्रोशित होकर ऐसा कुछ बोल सकते हैं जिनसे लोग आपसे नाराज़ हो सकते हैं.
चन्द्र व बुध की युतिचन्द्र के साथ बुध की युति शुभ फल देने वाली होती है. अगर आपकी कुण्डली में इन दोनों ग्रहों की युति बन रही है तो आप कूटनीतिज्ञ हो सकते हैं. अपनी वाणी से लोगों को आसानी से लोगों का दिल जितना आपको अच्छी तरह आता जिससे व्यावसायिक क्षेत्रों में आपको अच्छी सफलता मिलती है.
चन्द्र व गुरू की युति कुण्डली में चन्द्र के साथ गुरू की युति होना यह बताता है कि आप ज्ञानी होंगे. आपको शिक्षक एवं सलाहकार के रूप में अच्छी सफलता मिलेगी. लेकिन, आपको इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि मन में अभिमान की भावना नहीं आये. इसके अलावा आपको यह भी ध्यान रखना होगा कि बिना मांगे किसी को सलाह न दें क्योंकि बिना मांगे दी गई सलाह के कारण लोग आपसे दूरियां बनाने की कोशिश करेंगे.
चन्द्र व शुक्र की युति ज्योतिषशास्त्र की मान्यता है कि जिस व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्रमा शुक्र के साथ युति सम्बन्ध बनाता है वह सौन्दर्य प्रिय होते हैं. अगर आपकी कुण्डली में भी इन दोनों ग्रहों का युति सम्बन्ध बन रहा है तो हो सकता है कि आप अधिक सफाई पसंद व्यक्ति होंगे. कला के क्षेत्रों से आपका लगाव रहेगा. आप लेखन में भी रूचि ले सकते हैं. अत: अलस्य से दूर रहना चाहिए. दिखावे की प्रवृति से भी आपको बचना चाहिए. सुखों की चाहतों के कारण आप थोड़े आलसी हो सकते हैं
चन्द्र व शनि की युति चन्द्रमा के साथ बैठा शनि यह दर्शाता है कि व्यक्ति ईमानदार, न्यायप्रिय एवं मेहनती है. अगर आपकी कुण्डली में चन्द्र व शनि की यह स्थिति बन रही है तो आप भी परिश्रमी होंगे और मेहनत के दम पर जीवन में कामयाबी की तरफ अग्रसर होंगे. न्यायप्रियता के कारण अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने से पीछे नहीं हटेंगे. इस युति के प्रभाव के कारण कभी-कभी आप निराशावादी हो सकते हैं जिससे मन दु:खी हो सकता है अत: आशावादी बने रहना चाहिए.
चन्द्र व राहु की युति इन दोनों ग्रहों की युति कुण्डली में होने पर व्यक्ति रहस्यमयी विद्याओं में रूचि रखते हैं. अगर आपकी कुण्डली में यह युति बन रही है तो शिक्षा प्राप्त कर आप वैज्ञानिक बन सकते हैं. शोध कार्यों में भी आपको अच्छी सफलता मिल सकती है.
चन्द्र व केतु की युति कुण्डली में चन्द्र के साथ केतु की युति होने पर व्यक्ति को समझ पाना कठिन होता है क्योंकि ऐसा व्यक्ति कब क्या कर बैठे यह समझना मुश्किल होता है. अगर आपकी कुण्डली में यह युति बन रही है तो आपके लिए उचित होगा किसी भी कार्य को करने से पूर्व उस पर अच्छी तरह विचार करलें अन्यथा अपने कार्यों के कारण आपका मन दु:खी हो सकता है. वैसे, आपमें अच्छी बात यह है कि अपनी ग़लतियों से सबक लेंगे और अपने आस-पास की बुराईयों को दूर करने की कोशिश करेंगे.

कुत्ते के द्वारा शुभाशुभ शकुन विचारने का नियम

कुत्ता आज के जमाने में प्रत्येक घर में मिल जाता है,और सभी को पता है कि कुत्ता की अतीन्द्रिय जागृत होती है,किसी भी होनी अनहोनी को वह जानता है,अद्र्श्य आत्मा को देखने और किसी भी बदलाव को सूंघ कर जान लेने की क्षमता कुत्ते के अन्दर होती है,कुत्ते को दरवेश का दर्जा दिया गया है,समय असमय को बताने में कुत्ता अपनी भाषा में इन्सान को बताने की कोशिश करता है,और जो कुत्ते की भाषा को समझते है,वे अनहोनियों से बचे रहते है,और जो मूर्ख होते है,और अपने को जबरदस्ती हानि की तरफ़ ले जाना चाहते है वे उसकी भाषा को बकवास कह कर टाल देते है,कुत्ता अगर यात्रा के शुरु करते ही किसी कचडे पर पेशाब करता है,तो जान लीजिये कि यात्रा या शुरु किया जाने वाला कार्य सफ़ल है,यदि किसी सूखी लकडी पर पेशाब करता है,तो भौतिक धन की प्राप्ति होती है,अगर कुत्ता कांटेदार झाड पर,पत्थर या राख पर पेशाब करने के बाद काम शुरु करने वाले के आगे चल दे तो वह कार्य खराब हो जाता है,यदि कुत्ता किसी कपडे को लाकर सामने खडा हो तो समझना चाहिये कि कार्य सफ़ल है,यदि कुत्ता कार्य शुरु करने वाले के पैर चाटे,कान फ़डफ़डाये,अथवा काटने को दौडे तो समझना चाहिये कि सामने काफ़ी बाधायें आ रही है,यदि कुत्ता यात्रा के समय या काम शुरु करने के समय अपने शरीर को खुजलाना चालू कर दे तो जान लेना चाहिये के वह कार्य करने अथवा यात्रा पर जाने से मना कर रहा है,यदि कुत्ता किसी कार्य को शुरु करते वक्त या यात्रा पर जाते वक्त चारों पैर ऊपर की तरफ़ करके सोये तो भी कार्य या यात्रा नही करनी चाहिये,यदि गली मोहल्ले के आवारा कुत्ते किसी भी समय ऊपर की तरफ़ मुंह करके रोना चालू करें तो समझना चाहिये कि उस गली या मोहल्ले के प्रमुख व्यक्ति पर कोई मुशीबत आने वाली है,यात्रा करने के साथ या काम करने के साथ कुत्ते आपस में लड पडें तो भी काम या यात्रा में विघ्न पैदा होता है,कुत्ते के कान फ़डफ़डाने का समय सभी कामों के लिये त्यागने में ही भलाई होती है,कुत्ता अगर बैचैन होकर इधर उधर भागना चालू करे,तो समझना चाहिये कि कोई आकस्मिक मुशीबत आ रही है,किसी बात को सोचने के पहले या धन खर्च करते वक्त अगर कुत्ता अपनी पूंछ को पकडने की कोशिश करता है,तो मान लेना चाहिये कि आपने अपने भविष्य के लिये नही सोचा है,और खर्च करने के बाद पछताना पडेगा,कुत्ता अगर सुबह के समय लान या बगीचे में घास खा रहा हो तो समझ लेना चाहिये कि घर के अन्दर जो खाना बना है,उसमे किसी प्रकार इन्फ़ेक्सन है,कुत्ता अगर जूता लेकर भाग रहा हो तो समझना चाहिये कि वह बाहर जाने से रोक रहा है,लडकी के अपने ससुराल जाने के वक्त अगर कुत्ता रोना चालू कर दे,तो समझना चाहिये कि लडकी को ससुराल से वापस आने में संदेह है,कुत्ता अगर मालिक के पैर के पास जाकर सोना चालू कर दे तो समझना चाहिये कि घर में किसी सदस्य के आने का संकेत है,कुत्ता अगर अपने खुद के पैर चाटना चालू करे तो यात्राओं की शुरुआत समझनी चाहिये,कुत्ता अगर एकान्त में बैठना चालू कर दे,और बुलाने से आने में आनाकानी करे तो समझना चाहिये कि घर मे किसी सदस्य के लम्बी बीमारी में जाने का संकेत है,कुत्ता अगर पूंछ नीचे डालकर मुख्य दरवाजे के पास कुछ खोजने का प्रयत्न कर रहा हो तो समझना चाहिये कि कोई कर्जा मांगने वाला आ रहा है,कुत्ता अगर भोजन करते वक्त बार बार बाहर और अन्दर भाग रहा हो तो समझना चाहिये कि भोजन और कोई करने आने वाला है.